57 प्रतिशत भारतीयों की पसंद है स्पूतनिक वैक्सीन
सरकार द्वारा रशियन वैक्सीन स्पूतनिक के इमरजेंसी ट्राइल की अनुमति देने के बाद इस वैक्सीन का भारत में आने का रास्ता साफ हो गया है। रशियन डाइरेक्ट इनवेस्टमेंट फंड ने एक सर्वे के आधार पर दावा किया है कि भारत के 57 प्रतिशत लोग रशियन वैक्सीन को सर्वाधिक जानते हैं तथा पसंद करते हैं। सर्वे में दावा किया गया है कि संसार के 54 प्रतिशत लोगों का विश्वास है कि रूस बेहतर वैक्सीन बना सकता है।
आइए आपको बताएं कि यह वैक्सीन कैसे बनायी गई है तथा कैसे काम करती है। रशियन वैक्सीन साधारण जुकाम करने वाले एडीनोवायरस से बनायी गई है। एडीनोवायरस में कोरोना वायरस के स्पाइक प्रोटीन की जीन को जोड़ा गया है तथा वैक्सीन बनाने में दो प्रकार के एडीनोवायरस एडी 26 तथा एडी5 में यह जीन डाली गई है तथा उन्हें इस प्रकार बनाया गया है कि वे सेल में प्रवेश तो कर सकें किंतु उनकी संख्या बढ़ न सके। जैसे ही स्पूतनिक वैक्सीन हाथ में लगायी जाती है एडीनोवायरस शरीर की कोशिका में प्रवेश करता है। कोशिका एक बबल बनाकर उसे अंदर खींच लेती है। इसके बाद यह वायरस बबल में से निकलकर कोशिका के न्यूकलियस में पहुंच जाता है जहां कोशिका का डीएनए स्टोर होता है।
कोशिका के केंद्र में पहुंचकर यह अपना डीएनए कोशिका में छोड़ देता है, जिसे कोशिका अपने मैसेंजर आरएनए में कॉपी कर लेती हैं। जैसे ही एमआरएनए कोशिका के केंद्र से बाहर निकलता है, शरीर का इम्यून सिस्टम वायरस से लड़ने के लिए स्पाइक प्रोटीन तथा टीसेल बनाना शुरू कर देता है। एडीनोवायरस शरीर के अलार्म सिस्टम को शुरू कर देता है और शरीर प्रतिरोधी बी सेल बनाना शुरू कर देता है। बी सेल प्रतिरोधात्मक ताकत प्रदान करते हैं तथा टी सेल कोरोना वायरस को नष्ट कर देते हैं।
स्पूतनिक की दो डोज में हैं अलग-अलग एडीनोवायरस
डीएनए बेस्ड वैक्सीन होने के कारण स्पूतनिक को बहुत कम तापमान पर सुरक्षित करने की जरूरत नहीं पड़ती तथा फ्रिज के तापमान पर ही इसे सुरक्षित रखा जा सकता है। स्पूतनिक की पहली डोज एडी 26 एडीनोवायरस तथा दूसरी डोज एडी5 एडीनोवायरस को कोरोना के स्पाइक प्रोटीन की जीन को मिलाकर बनायी गई है।
कंपनी दावा कर रही है कि यह 91.6 प्रतिशत एफीसिएंशी का दावा कर रही है, हालांकि क्लीनिक ट्रायल की डिटेल स्टडी कंपनी द्वारा प्रकाशित नहीं की गई है। वैक्सीन कितने समय तक कोरोना वायरस से सुरक्षा प्रदान करेगी, यह भी अभी स्पष्ट नहीं है। हालांकि इम्यून सिस्टम के बी तथा टी सेल सालों तक वायरस को याद रखने की क्षमता रखते हैं।










