April 20, 2026
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आगरा में जांच प्रॉपर हो रहीं?

  • आरटीपीसीआर के नतीजे सटीक बशर्ते जांच के पूरे प्रोटोकॉल का पालन हो
  • कोरोना के मामलों में आरटीपीसीआर टेस्ट में गलती की गुंजाइश तभी है, जब जांच में किसी स्तर पर लापरवाही हो जाए

कोरोना वायरस की पहचान के लिए किए जाने वाली आरटीपीआर जांच पर पिछले दो दिन से सवाल उठ रहे हैं। कहा जा रहा है कि इस जांच से कोरोना पकड़ में नहीं आ रहा? कुछ चिकित्सक तो यहां तक कह चुके हैं कि आरटीपीसीआर 50 प्रतिशत फाल्स नेगेटिव आ रहा है और मरीज फेफड़ों के सीटी स्कैन से ही पकड़ में आ पा रहे हैं।  क्या ये सवाल वाकई जायज हैं। स्पेशलिस्ट यानि पैथोलॉजिस्ट इन सवालों को सिरे से नकारते हैं। वे कहते हैं, आरटीपीसीआर कोरोना की जांच का एकमात्र सटीक और विश्वसनीय टेस्ट है। हां, यह हो सकता है कि आरटीपीसीआर टेस्ट करते समय कुछ लापरवाहियां हो जाएं, जिसकी वजह से पॉजिटिव केस नेगेटिव आ जाए। आरटीपीसीआर न केवल आईसीएआर अपितु डब्लूएचओ से भी प्रमाणित है। आरटीपीसीआर मशीन पर पूरे प्रोटोकॉल का पालन करते सही तरह से सैंपलिंग, सही वायरल ट्रांसपोर्ट मीडियम का इस्तेमाल तथा आरएनए के सुरक्षित रहने के निर्धारित समय रहते जांच की जाए तो आरटीपीसीआर का नतीजा गलत हो ही नहीं सकता।

हम आपको बताते हैं कि आरटीपीसीआर टेस्ट के मायने क्या हैं। डीएनए बेस्ड यह जांच पूरे संसार में कोविड के लिए प्रामाणिक मानी जाती है। यदि तीन लेबल पर कोई गलती हो जाए तो यह जांच प्रभावित हो सकती है। सबसे पहले सैंपलिंग। यदि सैंपल लेते समय व्यक्ति ने गर्दन पीछे कर ली अथवा निर्धारित स्थान से गले व नाक के स्वेब का नमूना नहीं आया तो जांच का नतीजा प्रभावित हो सकता है। 90 प्रतिशत गलतियां सैंपलिंग के दौरान ही होती हैं।

नंबर दो- स्वैब को सही वायरल ट्रांसपोर्ट मीडियम में सुरक्षित रखना। वायरस को सुरक्षित रखने के कई क्वालिटी के मीडियम आ रहे हैं। यदि कम रेट वाले और कम गुणवत्ता वाले मीडियम में सैंपल को रखा गया है तो भी जांच प्रभावित हो सकती है।

नंबर तीन- सैंपल लेने के दो घंटे के अंदर आरएनए को जांच के लिए लगा देना। बता दें कि आरएनए दो घंटे तक ही सुरक्षित रह पाता है। यदि इन तीनों चरणों में किसी एक में भी गलती हुई तो सही रिपोर्ट आने की संभावना क्षीण हो जाती है। एक साथ बहुत सारे सैंपल एकत्रित होने पर सही समय पर सैंपल जांच के लिए लगाना भी मेडिकल स्टाफ के सामने एक चुनौती हो जाती है।

पूरे संसार में आरटीपीसीआर जांच को मान्यता इसलिए दी गई क्योंकि यह मशीन तीन जीन में संक्रमण पकड़ती है तथा एक सैंपल की जांच में साढ़े तीन घंटे का समय लगता है। वहीं ट्रू नेट मशीन एक जीन तथा जीन एक्सपर्ट मशीन दो जीन में संक्रमण की जांच करती है। एसएन मेडिकल कॉलेज में एक आरटीपीसीआर मशीन तथा दो ट्रू नेट मशीन हैं। सैंपल का लोड बहुत अधिक होने, स्टाफ का लंबे समय से लगातार स्ट्रेस में काम करने तथा प्री एनालेटिकल, एनालेटिकल तथा पोस्ट एनालेटिकल किसी भी चरण में कोई गलती होने पर रिपोर्ट प्रभावित हो सकती है। आगरा की बात करें तो एसएन मेडिकल कॉलेज तथा जिला अस्पताल में सैंपल देने वालों की लाइन लगी रहती है। वर्क लोड अधिक होने पर भी गलती की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। यहां यह तथ्य उल्लेखनीय है कि संसार में हुए विभिन्न अध्ययनों में पाया गया है कि कोविड के संक्रमण के आठ दिन बाद भी बीस प्रतिशत मरीजों की आरटीपीसीआर रिपोर्ट नेगेटिव आ सकती है। जॉन हापकिंस इंस्टीट्यूट में हुए अध्ययन में पाया गया कि कोविड संक्रमण के चार दिन बाद हुई आरटीपीसीआर की जांच में 67 प्रतिशत रिपोर्ट नेगेटिव दर्शाती हैं। बेहतर परिणाम के लिए संक्रमण का आठ दिन बाद सही प्रक्रिया अपनाते हुए जांच की जानी चाहिए। अध्ययन में यह भी पाया गया कि सभी प्रक्रियाओं का सही पालन करते हुए भी पांच में से एक मरीज पॉजिटिव होते हुए भी नेगेटिव पाया जाता है। ऐसे मरीजों का इलाज लक्षण के आधार पर किया जाना चाहिए।

इस संबंध में सीएमओ डॉ. आरसी पांडेय ने बताया कि गाइडलाइन के हिसाब से एंटीजन तथा आरटीपीसीआर पॉजिटिव आने पर ही मरीज को कोविड संक्रमित माना जा सकता है। जो मरीज नेगेटिव आ रहे हैं तथा उनकी हालत ठीक नहीं है, ऐसे मरीजों के लिए मूलचंद अस्पताल तथा स्पर्श मेहरोत्रा अस्पताल में व्यवस्था की गई है।

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