कोरोना की तेज रफ्तार ने दिला दी सौ साल पहले की याद
कोरोना की तेज रफ्तार को देखकर उम्रदराज लोग इसकी तुलना 1918 से 1920 तक फैले स्पेनिश फ्लू से कर रहे हैं। इस फ्लू में संसार में कई करोड़ लोगों ने अपनी जान गंवाई थी तथा ईश्वर की कृपा से ही लोग इससे बच सके थे। हालांकि कोरोना इतना जानलेवा नहीं है किंतु इसके फैलने की रफ्तार स्पेनिश फ्लू की तरह ही है।
डॉ. अरुण तिवारी बताते हैं कि उनके बाबा ने उन्हें स्पेनिश फ्लू के बारे में बताया था। उस समय उनका परिवार बाह तहसील में निवास करता था। वही समय वर्ल्ड वार वन का था। 1914 में शुरू हुआ वर्ल्ड वार वन 1918 में समाप्त होने को था। उसी समय स्पेनिश फ्लू का हमला संसार पर हुआ। इस फ्लू का कोई इलाज उस समय नहीं था। बताया जाता है कि आगरा कैंट एरिया में मंडलायुक्त की कोठी के पास एक बहुत बड़ा कब्रिस्तान है जिसे गोरों के कब्रितान के नाम से जाना जाता है। सैकड़ों अंग्रेज उस फ्लू में काल के गाल में समा गए थे तथा मरने वालों की संख्या इतनी अधिक थी कि कब्रिस्तान पूरा भर गया था।
डॉ. तिवारी के अनुसार उनके बाबा ने उनको बताया कि चंबल के करीब के गांवों में स्थिति यह थी कि बैलगाड़ी में लाशों को लेकर गांव के लोग खेतों पर बने श्मशान में जलाने जाते थे। लौट कर आते थे तो गांव में और नए मृत मिलते थे। इतने लोग प्रतिदिन मर रहे थे कि गांवों में लकड़ी तथा कंडे समाप्त हो गए थे। लकड़ी तथा कंडे समाप्त होने के बाद बचे हुए लोगों ने निर्णय किया कि मरने वाले लोगों को चंबल नदी में बहा दिया जाए। सैकड़ों मृत शरीर ईंधन के अभाव में चंबल नदी तथा यमुना नदी में बहाए गए।
1919 से 1920 तक फैले स्पेनिश फ्लू के शिकार हुए थे करोड़ों लोग
वर्तमान में स्पेनिश फ्लू की रफ्तार से ही फैल रहा कोरोना स्पेनिश फ्लू की तरह घातक नहीं है किंतु इसके फैलने की रफ्तार स्पेनिश फ्लू की तरह ही है। इससे बचाव का एक मात्र साधन दो गज दूरी मास्क है जरूरी है, जिसका पालन अभी तक शहरवासी पूरी तरह से नहीं कर रहे हैं।










